UPI ट्रांजैक्शन पर MDR का नया नियम: क्या यह आम आदमी की जेब पर बोझ बनेगा?
केंद्र सरकार द्वारा UPI (यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस) के नए फ्रेमवर्क को लेकर छिड़ा विवाद अब एक बड़े राजनीतिक संघर्ष का रूप लेता जा रहा है। नए नियमों के तहत, 15 सितंबर से ₹2,000 से अधिक के चुनिंदा मर्चेंट UPI ट्रांजैक्शन पर 0.4 प्रतिशत MDR (Merchant Discount Rate) लागू कर दिया गया है। वहीं, ₹75,000 से अधिक के बड़े लेनदेन पर इस शुल्क की अधिकतम सीमा ₹300 तय की गई है। हालांकि, सरकार ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि ₹2,000 तक के छोटे लेनदेन पूरी तरह शुल्क मुक्त रहेंगे और यह अतिरिक्त लागत ग्राहकों से नहीं, बल्कि भुगतान पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) के विभिन्न भागीदारों के बीच साझा की जाएगी। सरकार का तर्क है कि यह कदम UPI के इंफ्रास्ट्रक्चर को आधुनिक बनाने और साइबर सुरक्षा को सुदृढ़ करने के लिए अनिवार्य है।
विपक्ष का हमला: ‘अमेरिकी दबाव’ और ‘डिजिटल लूट’ का आरोप
इस नए नियम को लेकर कांग्रेस ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर तीखा हमला करते हुए आरोप लगाया कि यह निर्णय अमेरिकी पेमेंट कंपनियों के प्रभाव में लिया गया है। राहुल गांधी ने आंकड़ों के जरिए सरकार को घेरते हुए कहा कि भले ही ₹2,000 से अधिक के ट्रांजैक्शन की संख्या कुल ट्रांजैक्शन का मात्र 5% हो, लेकिन UPI के कुल ट्रांजैक्शन वैल्यू (मूल्य) में इनकी हिस्सेदारी लगभग 65 प्रतिशत है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भी इसे ‘डिजिटल लूट’ करार दिया। उन्होंने कहा कि बढ़ती महंगाई के बीच सरकार द्वारा डिजिटल भुगतान पर शुल्क लगाना आम जनता की बची-कुची बचत को खत्म करने की एक सोची-समझी योजना है।
चुनावी समीकरण: यूपी और पंजाब के रण में क्या भूमिका निभाएगा यह विवाद?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा आगामी विधानसभा चुनावों, विशेषकर उत्तर प्रदेश और पंजाब में बीजेपी के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है। 2024 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के उभार और बीजेपी के प्रदर्शन में गिरावट को देखते हुए, विपक्ष अब ‘संविधान बचाओ’ के नैरेटिव से आगे बढ़कर ‘आर्थिक बोझ’ और ‘आम आदमी की जेब’ जैसे जमीनी मुद्दों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। चूंकि यूपी और पंजाब जैसे राज्यों में छोटे व्यापारी और मध्यम वर्ग डिजिटल भुगतान पर अत्यधिक निर्भर हैं, इसलिए यदि MDR के मुद्दे को स्थानीय स्तर पर सफलतापूर्वक भुनाया गया, तो यह बीजेपी के ‘मिशन यूपी’ और पंजाब की चुनावी रणनीति में बड़ी बाधा बन सकता है।

