ईरान युद्ध का वैश्विक संकट: कच्चे तेल की कीमतों में उछाल से दुनिया भर में मचा हाहाकार, थम गई फैक्ट्रियां और सड़कों पर उतरे लोग

ईरान युद्ध का वैश्विक संकट: कच्चे तेल की कीमतों में उछाल से दुनिया भर में मचा हाहाकार, थम गई फैक्ट्रियां और सड़कों पर उतरे लोग

ईरान युद्ध का वैश्विक असर: $100 के पार पहुंचा कच्चा तेल

पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में खलबली मचा दी है। कच्चे तेल की कीमतों में हुई बेतहाशा बढ़ोतरी के चलते अब कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर चुकी हैं। यह संकट केवल पेट्रोल पंपों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (supply chain) को बुरी तरह प्रभावित किया है। दुनिया के विभिन्न हिस्सों में इसका असर परिवहन, कृषि, बिजली उत्पादन और बड़े उद्योगों पर साफ देखा जा रहा है, जिससे आम जनता का जीवन और वैश्विक अर्थव्यवस्था दोनों ही कठिन होते जा रहे हैं।

विभिन्न देशों में संकट की स्थिति और जनजीवन पर प्रभाव

ईंधन की बढ़ती कीमतों ने कई देशों की अर्थव्यवस्था और दैनिक जीवन को पटरी से उतार दिया है। फिलीपींस में डीजल महंगा होने के कारण मछुआरे अपनी नावें समुद्र में ले जाने में असमर्थ हैं, जिससे मछली की आपूर्ति बाधित होने का खतरा बढ़ गया है। वहीं, बांग्लादेश में गैस और बिजली की भारी कमी के चलते कपड़ा उद्योग, जो देश के निर्यात और रोजगार का मुख्य आधार है, बुरी तरह प्रभावित हुआ है। कई कारखानों को बिजली कटौती के कारण घंटों काम रोकना पड़ा है। इंडोनेशिया में भी स्थिति तनावपूर्ण है, जहां पेट्रोल की राशनिंग और लंबी कतारों के बीच छात्रों और टैक्सी ड्राइवरों ने ईंधन की कीमतों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

मध्य पूर्व और यूरोप में भी जनता का आक्रोश बढ़ता जा रहा है। सीरिया में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में 40% की भारी वृद्धि के बाद सड़कों पर टायर जलाकर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं। वहीं, पुर्तगाल में ड्राइवरों ने एक अनोखा विरोध प्रदर्शन शुरू किया है जिसे ‘बुजिनाओ’ (Buzinao) कहा जा रहा है—इसमें वे अपनी गाड़ियों की रफ्तार धीमी रखकर और लगातार हॉर्न बजाकर अपना गुस्सा जाहिर कर रहे हैं।

आर्थिक चुनौतियां और सरकारी राहत के प्रयास

सरकारों के लिए यह स्थिति एक कठिन नीतिगत दुविधा बन गई है। श्रीलंका जैसी अर्थव्यवस्थाएं, जो पहले से ही भारी कर्ज के संकट से जूझ रही हैं, इस उलझन में हैं कि वे ईंधन की कीमतें बढ़ाएं या सब्सिडी बढ़ाकर सरकारी खजाने पर बोझ डालें। दूसरी ओर, इटली सरकार ने इस संकट से निपटने के लिए एक अलग दृष्टिकोण अपनाया है। डीजल की कीमतों में संभावित वृद्धि को देखते हुए, मेलोनी सरकार ने जरूरतमंद कर्मचारियों को सीधे 100 यूरो (लगभग ₹11,100) का ‘फ्यूल बोनस’ देने का प्रस्ताव रखा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव (geopolitical tension) कम नहीं होता, तब तक वैश्विक ऊर्जा संकट और महंगाई का यह दौर जारी रह सकता है।