किशाऊ प्रोजेक्ट: यमुना बेसिन के लिए एक मील का पत्थर
नई दिल्ली में मंगलवार को एक अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ आया, जब केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली और पांच अन्य राज्यों ने लंबे समय से लंबित किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना के लिए एक ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर किए। केंद्रीय गृह और सहकारिता मंत्री अमित शाह तथा केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल की गरिमामयी उपस्थिति में हुए इस समझौते ने यमुना नदी के पुनरुद्धार की दिशा में एक नया अध्याय खोल दिया है। इस प्रोजेक्ट की परिकल्पना मूल रूप से 1940 में की गई थी, और अब लगभग 86 साल बाद इसके सफल क्रियान्वयन की राह पूरी तरह साफ हो गई है।
यह महत्वाकांक्षी परियोजना यमुना की प्रमुख सहायक नदी ‘टोंस’ पर हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा पर विकसित की जाएगी। समझौते के तकनीकी विवरणों के अनुसार, टोंस नदी पर लगभग 232 मीटर ऊंचा एक विशाल कंक्रीट ग्रेविटी बांध का निर्माण किया जाएगा। इस जलाशय की भंडारण क्षमता 1,562 मिलियन क्यूबिक मीटर होगी, जो न केवल दिल्ली के लिए पेयजल आपूर्ति को सुदृढ़ करेगी, बल्कि हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों के लिए भी जल प्रबंधन में क्रांतिकारी बदलाव लाएगी। इसके अतिरिक्त, यह प्रोजेक्ट लगभग 97,000 हेक्टेयर कृषि भूमि के लिए सिंचाई की सुविधा सुनिश्चित करेगा और 1,476 मिलियन यूनिट पनबिजली (hydroelectricity) पैदा करने का लक्ष्य रखता है।
केंद्र सरकार का बड़ा वित्तीय सहयोग और भविष्य की राह
अमित शाह ने इस परियोजना को ‘राष्ट्रीय परियोजना’ घोषित करते हुए एक बड़ी वित्तीय घोषणा की। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस विशाल प्रोजेक्ट का लगभग 90% वित्तीय भार केंद्र सरकार वहन करेगी, जबकि शेष 10% का खर्च 1994 के समझौते के प्रावधानों के अनुसार संबंधित राज्य उठाएंगे। शाह ने इस समझौते को जल संबंधी विवादों के समाधान की एक बड़ी श्रृंखला का हिस्सा बताया। उन्होंने लखवार, शाहपुर कंडी और केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट जैसे सफल समझौतों का उदाहरण देते हुए कहा कि 2018 से 2026 का यह कालखंड भारत में जल प्रबंधन और अंतर-राज्यीय विवादों को कुशलतापूर्वक सुलझाने के एक स्वर्णिम युग के रूप में पहचाना जाएगा।

