UCC को लेकर कई राज्यों ने पहले ही कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी है। उदाहरण के लिए, गुजरात, असम और मध्य प्रदेश में विधानसभा स्तर पर UCC लागू करने का प्रस्ताव पारित हो चुका है और अब बस राष्ट्रपति की मंजूरी और आधिकारिक अधिसूचना का इंतजार है। वहीं, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ ने भी इस कानून को तैयार करने के लिए विशेषज्ञ समितियां गठित की हैं। इस दिशा में TDP के नेता लावू कृष्ण देवरायुलु ने पार्टी के समर्थन की घोषणा की, हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि किसी भी लागू करने से पहले सभी संबंधित पक्षों से विस्तृत बातचीत करना अनिवार्य होगा।
इस बीच, गठबंधन के अन्य नेताओं ने भी अपनी राय रखी; शिवसेना नेता श्रीकांत शिंदे ने इसे राष्ट्रीय एकता और न्याय से जोड़ते हुए इसका समर्थन किया, जबकि HAM के अध्यक्ष संतोष कुमार सुमन ने भी शाह के बयान का स्वागत किया। इसके बावजूद, राष्ट्रीय स्तर पर इस मुद्दे पर सभी NDA घटक दल एकमत नहीं हैं, जैसा कि जम्मू-कश्मीर के सीएम उमर अब्दुल्ला ने भी इंगित किया है। विरोध की आवाजें भी लगातार आ रही हैं। बिहार में JDU नेता श्याम रजक ने स्पष्ट किया कि पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर UCC का समर्थन करती है, लेकिन बिहार की धरती पर इसे लागू नहीं होने देगी।
इसके अलावा, केरलम की मुस्लिम संस्था समस्त केरल जेम-इयातुल उलमा ने भी कड़ा विरोध दर्ज कराया है, उनका मानना है कि यह संहिता केवल मुस्लिमों तक सीमित नहीं है और सभी धर्मों के रीति-रिवाजों को पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं कर पाएगी। विशेषज्ञों के अनुसार, यद्यपि UCC का उद्देश्य सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक कानून लाना है, पर यह केवल नागरिक मामलों से जुड़ा होगा, न कि किसी भी धर्म की धार्मिक पूजा-पद्धति या आस्था से। इस प्रक्रिया के तहत, किसी भी राज्य में इसके लागू होने के लिए विधानसभा पारित करना, राज्यपाल की मंजूरी और फिर अधिसूचना जारी होना आवश्यक होगा, जो इसकी जटिलता को दर्शाता है।

