अलार्मिंग चेतावनी: हिमालय के ग्लेशियर 65% तेज गति से पिघल रहे, भारत के लिए ‘हिंदू कुश संकट’ का खतरा

अलार्मिंग चेतावनी: हिमालय के ग्लेशियर 65% तेज गति से पिघल रहे, भारत के लिए ‘हिंदू कुश संकट’ का खतरा

हाल ही में सामने आए एक गंभीर शोध ने भारतीय हिमालयी क्षेत्र के लिए एक बड़ी चेतावनी जारी की है। रिपोर्ट के अनुसार, हिमालय के ग्लेशियर अभूतपूर्व गति से पिघल रहे हैं, जो पिछले एक दशक की तुलना में करीब दो-तिहाई (65%) अधिक तेज है। यह केवल एक पर्यावरणीय मुद्दा नहीं है, बल्कि यह भारत की जल सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और प्राकृतिक आपदा प्रबंधन के लिए एक अस्तित्वगत संकट है। शोधकर्ताओं ने विशेष रूप से ‘ब्लैक कार्बन’ को इस तेज पिघलने का प्रमुख कारण बताया है, जिसे रोकने पर भारत को तत्काल कार्य करने की आवश्यकता है।

यह व्यापक अध्ययन ग्लोबल कंसल्टेंसी सिस्टमिक ने इंटीग्रेटेड माउंटेन इनिशिएटिव के सहयोग से किया है। इस रिपोर्ट में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं: भले ही हिमालयी क्षेत्र में भारत की भूमि केवल 18% है, लेकिन देश की 35% प्राकृतिक आपदाएं इसी क्षेत्र में होती हैं। इसके अलावा, यह क्षेत्र देश की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 20% का महत्वपूर्ण योगदान देता है। शोध ने यह भी दर्शाया है कि ब्लैक कार्बन, जो मुख्यतः मैदानी इलाकों के औद्योगिक स्रोतों से उत्सर्जित होता है, ग्लेशियरों को पिघलाने में एक तिहाई (1/3) योगदान दे रहा है। यह चेतावनी विशेष रूप से हिंदू कुश क्षेत्र के लिए भयावह है, जहां अनुमान है कि वर्ष 2100 तक मौजूदा ग्लेशियरों का 80% पानी में परिवर्तित हो सकता है।

रिपोर्ट में भविष्य की जल उपलब्धता पर भी गहन विश्लेषण किया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालय बेसिन की अधिकांश नदियों में पानी का स्तर इस सदी के मध्य तक अपने चरम (Peak) पर पहुंच सकता है। यह वह चरण होगा जब ग्लेशियरों के पिघलने से नदियों में पानी का अधिकतम जमाव होता है। हालांकि, इसके बाद, ग्लेशियरों के लगातार घटने के कारण, यह जल प्रवाह धीरे-धीरे सूखना शुरू हो जाएगा। यह अध्ययन न केवल वैश्विक वॉर्मिंग के प्रभावों को रेखांकित करता है, बल्कि यह भी बताता है कि ब्लैक कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित करने पर भारत जैसे देश किस प्रकार इस महासंकट को कम करने में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।