हरिद्वार में दिखी श्रवण कुमार की मिसाल, नातियों ने 115 वर्षीय दादी को कांवड़ में बैठाकर कराई यात्रा

हरिद्वार में दिखी श्रवण कुमार की मिसाल, नातियों ने 115 वर्षीय दादी को कांवड़ में बैठाकर कराई यात्रा

हरिद्वार। धर्मनगरी हरिद्वार में इस वर्ष कांवड़ यात्रा केवल आस्था का ही नहीं, बल्कि माता-पिता और बुजुर्गों के प्रति सम्मान और सेवा का भी अनूठा संदेश दे रही है। यात्रा मार्ग पर ऐसे कई भावुक दृश्य देखने को मिल रहे हैं, जहां शिवभक्त अपने माता-पिता और बुजुर्गों को कांवड़ में बैठाकर पुण्य यात्रा करा रहे हैं। इन तस्वीरों ने श्रद्धालुओं के साथ-साथ राहगीरों का भी दिल जीत लिया है।

ऐसा ही एक भावुक दृश्य रविवार को हरिद्वार में देखने को मिला। उत्तर प्रदेश के संभल जिले के खेतापुर गांव निवासी प्रमोद और सतपाल अपनी करीब 115 वर्षीय दादी को कांवड़ के एक पलड़े में बैठाकर और दूसरे पलड़े में मां गंगा का पवित्र जल रखकर पैदल अपने गंतव्य की ओर रवाना हुए। इस अनोखी कांवड़ को देखने के लिए रास्ते भर लोगों की भीड़ उमड़ती रही। श्रद्धालु इस पल को अपने मोबाइल कैमरों में कैद करते नजर आए।

दोनों नातियों ने बताया कि उनकी दादी अब चलने-फिरने में असमर्थ हैं, लेकिन उनकी लंबे समय से इच्छा थी कि वह भी कांवड़ यात्रा का पुण्य प्राप्त करें। दादी की इसी इच्छा को पूरा करने के लिए उन्होंने उन्हें कांवड़ में बैठाकर यात्रा कराने का संकल्प लिया। इस धार्मिक यात्रा में परिवार के अन्य सदस्य भी उनके साथ चल रहे हैं। पूरे रास्ते दादी भगवान शिव का स्मरण करती रहीं और हाथ जोड़कर श्रद्धालुओं का अभिवादन करती नजर आईं।

इसी तरह मेरठ की सरधना तहसील की रहने वाली राजकुमारी को उनके बेटे अनुज और सुशील कुमार कांवड़ में बैठाकर हरिद्वार से मेरठ तक की यात्रा करा रहे हैं। दोनों भाई गंगा जल के साथ अपनी मां को भी कांवड़ में लेकर पैदल चल रहे हैं।

अनुज ने बताया कि करीब दो वर्ष पहले उनकी मां गंभीर रूप से बीमार हो गई थीं। उस समय उन्होंने भगवान भोलेनाथ से उनकी सलामती की प्रार्थना की थी। मां के स्वस्थ होने के बाद उन्होंने संकल्प लिया था कि मनोकामना पूरी होने पर उन्हें स्वयं कांवड़ यात्रा कराएंगे। इस वर्ष उन्होंने अपना वह संकल्प पूरा किया।

हरिद्वार की कांवड़ यात्रा में सामने आ रहे ऐसे दृश्य यह संदेश दे रहे हैं कि सच्ची भक्ति केवल भगवान की आराधना तक सीमित नहीं है, बल्कि माता-पिता और बुजुर्गों की सेवा भी उतनी ही बड़ी पूजा मानी जाती है। यही कारण है कि इस बार कांवड़ यात्रा में श्रद्धा के साथ-साथ पारिवारिक संस्कारों की भी अनूठी झलक देखने को मिल रही है।