उत्तराखंड की बढ़ती बिजली जरूरत को पूरा करने के लिए प्रस्तावित 1320 मेगावाट थर्मल पावर खरीद को लेकर प्रदेश में सियासी विवाद शुरू हो गया है। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि टेंडर प्रक्रिया में बड़े स्तर पर बदलाव कर इसका लाभ अडानी समूह को पहुंचाने की कोशिश की गई। वहीं, सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए प्रक्रिया को नियमों के मुताबिक बताया है।
कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने 17 सितंबर को दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर दावा किया कि टेंडर के 86 में से 84 नियमों में बदलाव किए गए और इसके बाद टेंडर अडानी समूह को दिए जाने की स्थिति बनाई गई। उन्होंने छत्तीसगढ़ में अडानी की कंपनी को कोयला खनन से लेकर बिजली उत्पादन और परिवहन तक की भूमिका मिलने का भी आरोप लगाया।
इन आरोपों पर उत्तराखंड के प्रमुख सचिव ऊर्जा आर. मीनाक्षी सुंदरम ने कहा कि बिजली खरीद की पूरी प्रक्रिया निर्धारित नियमों, तकनीकी जरूरतों, प्रतिस्पर्धी निविदा और UERC की मंजूरी के आधार पर आगे बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि किसी एक कंपनी को लाभ पहुंचाना उद्देश्य नहीं है, बल्कि राज्य की दीर्घकालिक बेस-लोड बिजली जरूरत को सुरक्षित करना है।
सुंदरम के मुताबिक, भारत सरकार का 2019 का मॉडल बिडिंग डॉक्यूमेंट एक सामान्य दस्तावेज है। अलग-अलग परियोजनाओं की तकनीक, ईंधन उपलब्धता और परिवहन लागत को देखते हुए निविदा में जरूरी बदलाव किए जा सकते हैं। बोलीदाताओं से मिले सुझावों के बाद प्रस्तावित बदलावों को UERC के सामने रखा गया, जहां विचार-विमर्श के बाद उन्हें मंजूरी दी गई।
उन्होंने बताया कि RFQ चरण में पांच कंपनियां योग्य पाई गई हैं और आगे भी प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया जारी है। अंतिम चयन कुल टैरिफ के आधार पर किया जाएगा।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि संयंत्र का उत्तराखंड में ही लगाया जाना अनिवार्य नहीं है। कंपनियों को देश में उपयुक्त स्थान चुनने की छूट दी गई है, ताकि ईंधन और परिवहन लागत को ध्यान में रखते हुए प्रतिस्पर्धी दर मिल सके। वहीं, 1320 मेगावाट की पहली यूनिट 42 महीने और दूसरी यूनिट 48 महीने में उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है।
फिक्स चार्ज की सीमा 70 से बढ़ाकर 75 प्रतिशत किए जाने पर भी सरकार ने कहा कि इससे उपभोक्ताओं पर स्वतः अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा। वास्तविक वित्तीय प्रभाव प्रतिस्पर्धी बोली से तय होने वाले कुल टैरिफ पर निर्भर करेगा।
इसके अलावा, 1320 मेगावाट बिजली के लिए UJVNL और THDC के संयुक्त उपक्रम के विकल्प पर भी विचार किया गया था, लेकिन THDC की विशेषज्ञता मुख्य रूप से हाइड्रो और पंप स्टोरेज परियोजनाओं में होने तथा आवश्यक स्वीकृतियों की जरूरत के चलते इस विकल्प को आगे नहीं बढ़ाया जा सका।

