कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के क्षेत्र में अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा अब वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव का केंद्र बन गई है। AI की तीव्र प्रगति ने न केवल तकनीकी कंपनियों को बल्कि अंतर्राष्ट्रीय मंचों को भी झकझोर दिया है। अमेरिका के प्रमुख टेक लीडर्स और विशेषज्ञ खुले तौर पर चेतावनी दे रहे हैं कि चीन की AI में बढ़त दुनिया के लिए एक गंभीर खतरा पैदा कर सकती है, जिसके जवाब में चीन ने इसे ‘डर फैलाने’ और ‘गलत नीयत’ वाला कदम करार दिया है। यह टकराव स्पष्ट रूप से एक नए तकनीकी ‘कोल्ड वॉर’ का रूप ले रहा है, जहां दोनों महाशक्तियां अपनी तकनीकी श्रेष्ठता साबित करने में जुटी हैं।
इस बहस के केंद्र में एंथ्रोपिक (Anthropic) के CEO डारियो अमोदेई का एक लेख है, जिसमें उन्होंने सुझाव दिया कि संभावित जोखिमों को देखते हुए कंपनियों को जानबूझकर अपने AI मॉडलों को विकसित करने की गति धीमी करनी चाहिए। यह टिप्पणी OpenAI और एलन मस्क जैसे दिग्गजों के समर्थन के बाद आई है। दूसरी ओर, चीन ने सरकारी मंचों के माध्यम से कड़ी आपत्ति जताई है। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने स्पष्ट किया कि इस तरह की प्रतिस्पर्धा से वैश्विक AI गवर्नेंस प्रक्रिया में केवल रुकावट आएगी। इसके अलावा, चीन राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भारत में BRICS समिट के दौरान ओपन-सोर्स AI मॉडल विकसित करने में वैश्विक सहयोग की पेशकश की, जिससे यह साफ होता है कि चीन इस क्षेत्र में वैश्विक लीडरशिप का दावा कर रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह पूरा घटनाक्रम एक ‘हथियारों की होड़’ जैसा माहौल बना रहा है, जहां सहयोग की बातें करने के बावजूद आपसी अविश्वास गहरा है। एक पॉलिटिकल साइंस प्रोफेसर ने इस स्थिति को बताते हुए कहा कि दोनों देश ‘खुद नियम बनाना चाहते हैं’ और शांति के लिए आत्म-नियंत्रण आवश्यक है, जो वर्तमान माहौल में कठिन है। अमेरिका की ओर से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुद को AI में चीन से आगे बताते हुए दावा किया है कि अमेरिका दुनिया का सबसे उन्नत देश है। इस विरोधाभासी स्थिति से यह स्पष्ट होता है कि AI की प्रगति को नियंत्रित करने और वैश्विक स्थिरता बनाए रखने के लिए बड़े पैमाने पर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की तत्काल आवश्यकता है, अन्यथा यह तकनीकी श्रेष्ठता की दौड़ एक बड़े भू-राजनीतिक विभाजन में बदल सकती है।


