भारत-पाक युद्ध के वो जांबाज योद्धा, जिन्होंने बदल दिया युद्ध का इतिहास
1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान लेफ्टिनेंट कर्नल अर्देशिर बुर्जोरजी तारापोर की वीरता की गाथा भारतीय सैन्य इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। ’17 हॉर्स’ के कमांडिंग ऑफिसर के रूप में उन्होंने चाविंडा और फिलोरा के बीच दुश्मन की घेराबंदी को तोड़ते हुए युद्ध का रुख ही बदल दिया था। जब पाकिस्तानी सेना ने वजीरअली से जवाबी हमला किया, तब तारापोर ने अपनी रणनीति और साहस से न केवल दुश्मन के बख्तरबंद वाहनों को पीछे धकेला, बल्कि फिलोरा पर भी अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। उनकी अगुवाई में भारतीय सेना ने दुश्मन के टैंकों के बेड़े को ऐसी चुनौती दी कि पाकिस्तानी सेना को चाविंडा से पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा।
साहस की मिसाल: ग्रेनेड की घटना से परमवीर चक्र तक का सफर
तारापोर का सैन्य करियर साहस और सूझबूझ का एक अद्भुत संगम रहा है। उनके आर्मर्ड रेजिमेंट में शामिल होने के पीछे एक रोमांचक घटना जुड़ी है; एक बार ग्रेनेड को सुरक्षित फेंकने के प्रयास में घायल होने के बावजूद उन्होंने अपनी हिम्मत नहीं हारी, और इसी जांबाजी ने उन्हें ‘1st हैदराबाद इंपीरियल सर्विस लांसर्स’ में ट्रांसफर दिलाने में मदद की। 1965 के युद्ध के दौरान, वे गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद पीछे नहीं हटे। उन्होंने 9 गढ़वाल बटालियन और अन्य रेजिमेंटों के साथ मिलकर वजीरअली, जस्सोरां और बुतुर-डोगरांडी जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर कब्जा करने के लिए निरंतर हमले जारी रखे। उनकी नेतृत्व क्षमता का ही परिणाम था कि भारतीय सैनिकों ने दुश्मन के लगभग 60 टैंकों को नष्ट कर दिया, जबकि भारतीय पक्ष को केवल 9 टैंकों का ही नुकसान उठाना पड़ा।
अंतिम शहादत और अमर विरासत
16 सितंबर 1965 को युद्ध के मैदान में एक भीषण संघर्ष के दौरान, दुश्मन के एक गोले ने उनके टैंक को निशाना बनाया। टैंक में आग की लपटें उठने के बावजूद, एक सच्चे सैन्य नेता की तरह वे अंत तक अपनी टुकड़ी का नेतृत्व करते रहे और अंततः वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी इस सर्वोच्च शहादत के लिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। उनकी अंतिम इच्छा का सम्मान करते हुए, 17 सितंबर 1965 को जसोरां के युद्ध क्षेत्र में ही उनका अंतिम संस्कार किया गया।
आज भी लेफ्टिनेंट कर्नल तारापोर की विरासत जीवित है। उनके सम्मान में भारत सरकार ने एक बड़ा कदम उठाते हुए अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के एक द्वीप का नामकरण उनके नाम पर किया है। शिवाजी की सेना में सेवा करने वाले उनके पूर्वजों की वीरता की परंपरा को तारापोर ने अपने बलिदान से एक नई ऊंचाई दी, जो आज भी देश के युवाओं के लिए प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत है।


